Monday, October 15, 2018

कहानी एक लेडीज़ पार्लर चलाने वाले पुरुष की

उत्तराखंड के छोटे शहर रुड़की में शायद मैं पहला या दूसरा मर्द था जिसने कोई लेडीज़ पार्लर खोला था.
मेरी इस च्वाइस पर मेरे जानने वाले तो नाक-भौंह सिकोड़ते ही थे, महिला कस्टमर्स में भी हिचकिचाहट थी.
पड़ोसी तरह-तरह की बातें बनाया करते और कहते कि लेडीज़ पार्लर तो लड़कियों का काम है.
लड़कियों को मनाना, उनका विश्वास जीतना और यह बताना कि मैं भी किसी लड़की से कम अच्छा मेकअप नहीं कर सकता, बहुत मुश्किल था.
अगर कोई लड़की मेरे पार्लर में आती भी थी तो उनके पति, भाई या पिता मुझे देखकर उन्हें रोक देते. वो कहते, अरे! यहां तो लड़का काम करता है.
लड़कियां मुझसे थ्रेडिंग तक करवाने से साफ़ इनकार कर देती. 8X10 के कमरे में शायद एक लड़के का उनके क़रीब आकर काम करना उन्हें असहज करता था.
सवाल मेरे ज़हन में भी थे. क्या लड़कियां मुझसे उतना ख़ुल पाएंगी जैसे एक पार्लर वाली लड़की को अपनी पसंद-नापसंद बता पाती हैं.
ऐसा नहीं कि मुझे इस सबका अंदाज़ा नहीं था. लेकिन जब अपने मन के काम को बिज़नेस में बदलने का मौका मिला तो मैं क्यों छोड़ता?
शुरुआत दरअसल कई साल पहले मेरी बहन की शादी के दौरान हुई. उसके हाथों में मेहंदी लगाई जा रही थी और वो मेहंदी लगाने वाला एक लड़का ही था.
बस लड़कपन की उस शाम मेरे दिलो-दिमाग में मेंहदी के वो डिज़ाइन रच-बस गए.
कोन बनाना सीखा, कागज़ पर अपना हाथ आज़माया और फिर मैं भी छोटे-छोटे बच्चों के हाथों में मेहंदी लगाने लगा.
कुछ दिन बाद जब घर पर इस बारे में पता चला, तो खूब डांट पड़ी.
पापा ने सख्त लहज़े में कहा कि मैं यह लड़कियों जैसे काम क्यों कर रहा हूं. वो चाहते थे कि मैं उन्हीं की तरह फ़ौज में चला जाऊं.
लेकिन मुझे फ़ौज या कोई भी दूसरी नौकरी पसंद ही नहीं थी.
फिर एक बार मैं एक शादी में गया और वहां मैंने औरतों के हाथों में मेहंदी लगाई जो काफ़ी पसंद की गई. इसके एवज़ में मुझे 21 रुपए मिले.
मेरी जीवन की ये पहली कमाई थी. मेरी मां और भाई-बहन मेरे शौक को पहचान चुके थे लेकिन पापा को ये अब भी नागवारा था.
हारकर मैं हरिद्वार में नौकरी करने लगा. सुबह नौ से पांच वाली नौकरी. सब ख़ुश थे क्योंकि मैं मर्दों वाला काम कर रहा था.
पर मेहंदी लगाने का शौक़ मेरे दिल के एक कोने में ही दफ़्न होकर रह गया.
रह-रहकर एक हूक सी उठती कि इस नौकरी से मुझे क्या मिल रहा है. ना तो बेहतर पैसा ना ही दिल का सुकून.
इस बीच लंबी बीमारी के बाद पापा चल बसे, घर का ख़र्च चलाने की ज़िम्मेदारी अचानक मेरे कंधों पर आ गई.
लेकिन, इसी ज़िम्मेदारी ने मेरे लिए नए रास्ते भी खोल दिए. मैं जब छुट्टी पर घर आता तो शादियों में मेहंदी लगाने चला जाता.
यहां मेरी महीने की तन्ख्वाह महज़ 1,500 रुपए थी, वहीं शादी में मेंहदी लगाने के मुझे करीब 500 रुपये तक मिल जाते थे.
शायद कमाई का ही असर था कि अब परिवार वालों को मेरा मेहंदी लगाना ठीक लगने लगा था.
उसी दौरान मुझे पता चला कि ऑफिस में मेरा एक साथी अपनी पत्नी के ब्यूटी पार्लर में उनकी मदद करता है, और दोनों अच्छा-खासा पैसा कमा लेते हैं.
मन में कौंधा, की क्यों न मैं भी अपना एक ब्यूटी पार्लर खोल लूं?
लेकिन यह सुझाव जब मैंने अपने परिवार के सामने रखा तो एकाएक सभी की नज़रों में बहुत से सवाल उठ खड़े हुए. वही लड़कियों का काम - लड़कों का काम वाले सवाल.
पर ठान लो तो रास्ते ख़ुल ही जाते हैं.
मेरे मामा की लड़की ब्यूटी पार्लर का काम सीख रही थी. उसने वही सब मुझे सिखाना शुरू कर दिया.
और फिर हमने मिलकर एक पार्लर खोला. शुरुआती दिनों की चुनौतियां भी उसी की मदद से हल हुईं.
पार्लर में मेरे अलावा, मेरी बहन यानी एक लड़की का होना महिला कस्टमर्स का विश्वास जीतने में सहायक रहा.
हमने अपने छोटे से कमरे में ही परदे की दीवार बना दी. मेरी बहन लड़कियों की वैक्सिंग करती और मैं उनकी थ्रेडिंग और मैक-अप.
उम्र और अनुभव के साथ मैं अपने काम की पसंद के बारे में मेरा विश्वास और बढ़ गया था.
शादी के लिए लड़की देखने गया तो उसने भी मुझसे यही सवाल किया, ''आखिर यह काम क्यों चुना?''
मेरा जवाब था, ''यह मेरी पसंद है, मेरी अपनी च्वाइस.''
उसके बाद से आज तक मेरी पत्नी ने मेरे काम पर सवाल नहीं उठाए.
वैसे भी वो मुझसे 10 साल छोटी है, ज़्यादा सवाल पूछती भी कैसे.
शादी के बाद मैंने पत्नी को ब्यूटी पार्लर दिखाया, अपने कस्टमर और स्टाफ से भी मिलवाया. मैं चाहता था कि उनके मन में किसी तरह का कोई शक़ ना रहे.
पिछले 13 साल में 8x10 का वो छोटा सा पार्लर, तीन कमरों तक फैल चुका है.
अब रिश्तेदार भी इज़्ज़त करते हैं और मुझे ताना देनेवाले मर्द अपने घर की औरतों को मेरे पार्लर में खुद छोड़कर जाते हैं.
(ये कहानी एक पुरुष की ज़िंदगी पर आधारित है जिनसे बात की बीबीसी संवाददाता नवीन नेगी ने. उनकी पहचान गुप्त रखी गई है. इस सिरीज़ की प्रोड्यूसर

Monday, October 8, 2018

研究称气候变化恐削弱电力生产

今天,一项新的研究警告称,全球升温将会减少河流湖泊的水源供给,从而给多种发电形式产生至关重要的影响。因此,各国政府和全球能源行业需要采取重大措施加以应对。

水力、燃煤、燃气、核能和生物质发电量目前占据全球电力产量的98%。这些电厂的有效运转依赖于充足的供水,对淡水供应的需求很大。受气候变化、污染和全球人口不断增长的影响,淡水资源已经十分紧张。

刊登在环保类期刊《自然气候变化》上的这项研究表明,预期气温上升有可能会进一步造成河流湖泊水量减少、内陆水域水温升高,从而导致发电量降低。


国际应用系统分析研究所( )项目主管兼报告共同作者  表示,“这是首次从全球角度对气候变化、水资源、电力生产之间的关系进行研究。我们清晰地指出:发电厂不仅会导致气候变化,同时也是气候变化的受害者。”

该研究将美国、拉丁美洲南部、南非、中欧和南欧、东南亚、南澳大利亚列为最脆弱地区。气候变化将有可能最大程度地影响这些地区驱动水力涡轮发电机或参与燃煤和核能发电厂冷却环节的水资源的供应。

2040年到2069年,气候变化对水资源供应的影响将有可能波及世界60%的发电厂。在该阶段,若要切实避免气候发生不可挽回的变化,世界各国就需要实现从煤炭向其他资源的转移。

前兆


在过去几十年里,多例极端气候事件已经向各国政府和能源公司发出了一个信号:气候变化将有可能会给电力行业带来严重的破坏,造成电力供应中断,以及重大的经济损失。

由于常年干旱,美国西部地处“阳光地带”的一些高速发展的城市已经开始打算另辟蹊径,不再依赖胡佛大坝等大型水利设施来满足其电力需求。

2003年,欧洲西北部地区遭受了极端热浪。由于河水温度不断升高严重影响了电厂的冷却系统,多家核电厂被迫关闭。前几年,中国西部地区降水过少导致水力发电量减少。在降水量上升到接近正常水平之前,当地电网不得不重新依靠燃煤电厂供电。

包括中国、印度在内的许多国家都在各自的气候计划,即12月份签订的《巴黎协议》的基础文件《国家自主贡献》( )中着重强调要大力开发水电资源。

由于原子能成本不断增加,核电并未像水电那样受到重视。但是对于印度等计划扩大燃煤发电的国家来说,水资源短缺将有可能威胁其未来的电力供应。

如何应对

  的研究建议各国提高电厂能效,并鼓励安装能够能应对供水不足状况的冷却系统。该项研究的负责人米歇尔
•冯丽德指出,在干旱时期,各国政府以及电力公司应当有效调节供水。

他还表示,除了减排之外,电力行业还需要加强适应气候变化的能力。

气候活动家们希望《巴黎协议》确定的2℃和1.5
℃的温升目标、以及长期脱碳计划能够鼓励风能和太阳能的发展,从而能够更快地取代煤炭。相较于热能发电和水电,风能和太阳能技术对水的依赖程度更低。

发展中国家希望富裕国家兑现他们的承诺,提供资金帮助其他国家应对全球气温上升带来的影响、提供包括电力供应设备在内能够抵御气候变化的关键基础设施。

不论是发展中国家,还是发达国家,都将不得不应对气候变化导致的洪水等与水资源相关的问题。去年12月份,英国降水量创下了有史以来的新纪录,造成许多配电站被淹,导致电力中断,数以万计的居民受到影响。而由此造成的高额赔偿也引起了世界各大再保险公司和金融监管部门
越来越多的关注。

Tuesday, October 2, 2018

छत्तीसगढ़: हिदायतुल्ला नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के कुलपति का इस्तीफ़ा

छत्तीसगढ़ की हिदायतुल्ला नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के कुलपति डॉ. सुखपाल सिंह ने अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया है.
यूनिवर्सिटी के आठ सौ से अधिक छात्र-छात्राओं ने कुलपति के ख़िलाफ़ गंभीर आरोप लगाते हुए उनपर 'अविश्वास' जताया था और पिछले सात दिनों से छात्र-छात्राएं आंदोलन कर रहे थे.
इन आंदोलनकारियों ने सोमवार से अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरु कर दी थी. इसके बाद सोमवार की शाम को ही कुलपति के इस्तीफ़े की बात सामने आई.
डॉ. सुखपाल सिंह ने पत्रकारों से बातचीत में कहा, "इतने अपमान के बाद इस पद पर रहने का कोई मतलब नहीं है. इसलिए मैंने यूनिवर्सिटी के कुलाधिपति और छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को इस्तीफ़ा दे दिया है."
डॉ. सुखपाल सिंह को 5 मार्च 2011 को रायपुर के हिदायतुल्ला नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी का कुलपति नियुक्त किया गया था. ये नियुक्ति पांच साल या 65 वर्ष तक की आयु के लिए की गई थी.
इसके बाद 6 सितंबर 2014 को नियम में बदलाव कर उनकी सेवा अवधि में विस्तार कर दिया गया. नए नियम के तहत ये नियुक्ति पांच साल या 70 वर्ष तक की आयु के लिए की गई थी.
इसे सेवावृद्धि के ख़िलाफ़ यूनिवर्सिटी के ही सहायक प्राध्यापक डॉ. अविनाश सामल ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की, जिसे हाईकोर्ट की एकल पीठ ने तो खारिज कर दिया लेकिन इसी साल 27 अगस्त को हाईकोर्ट की युगल पीठ ने डॉ. सुखपाल सिंह की सेवावृद्धि के आदेश को रद्द कर दिया.
इस बीच 27 अगस्त से ही यूनिवर्सिटी के छात्र-छात्राओं ने हिदायतुल्ला नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी में छात्राओं की यौन प्रताड़ना और आर्थिक भ्रष्टाचार समेत विभिन्न मुद्दों को लेकर अनिश्चितकालीन प्रदर्शन शुरू कर दिया. पिंजरा तोड़ो' नाम से शुरू किए गए इस आंदोलन में इन विद्यार्थियों की मांग थी कि यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले लड़के-लड़कियों को 24 घंटे कैंपस के भीतर कहीं भी आने-जाने की छूट मिले. इसके अलावा यूनिवर्सिटी की लाइब्रेरी भी 24 घंटे खुली रखी जाए. साथ ही यूनिवर्सिटी की कार्य परिषद की बैठकों की कार्रवाई सार्वजनिक की जाए.
इस दौरान 60 से अधिक लड़कियों ने अपने साथ यौन प्रताड़ना की शिकायत करते हुए मांग की कि जिन शिक्षकों पर आरोप लगे हैं, उन्हें जांच पूरी होने तक निलंबित रखा जाए.
इस आंदोलन को देश भर से समर्थन मिला और दस दिनों तक चले आंदोलन के बाद अंततः प्रभारी कुलपति रविशंकर शर्मा ने इन मांगों पर कार्रवाई भी शुरू की. रात तीन बजे तक यूनिवर्सिटी की लाइब्रेरी और रात सवा तीन बजे तक हॉस्टल खुले रखने की शुरुआत भी कर दी गई.
यौन प्रताड़ना, आर्थिक भ्रष्टाचार, बजट, कार्य परिषद के फ़ैसले जैसे कई मुद्दों पर यूनिवर्सिटी ने तत्काल जांच और कार्रवाई के निर्देश दिए.
कुछ मामलों में जांच के लिए कमेटी भी बनाई गई.
इन प्रदर्शन और कार्रवाइयों के बीच ही 20 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट ने डॉ. सुखपाल सिंह की सेवावृद्धि को रद्द करने के छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी.
24 सितंबर को छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और कुलाधिपति ने फिर से डॉ. सुखपाल सिंह की नियुक्ति का आदेश जारी कर दिया. लेकिन अगले दिन जब डॉ. सुखपाल सिंह यूनिवर्सिटी पहुंचे तो विद्यार्थियों ने फिर से उनके ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया.
स्टूडेंट्स बार एसोसिएशन के आकांश जैन कहते हैं, "डॉ. सुखपाल सिंह ने अपने कार्यकाल में लगातार भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया, सारी शिकायतों की अनसुनी की, लड़कियों के साथ यौन प्रताड़ना को कभी गंभीरता से नहीं लिया. आख़िर उनके रहते हम यूनिवर्सिटी में बेहतर शैक्षणिक वातावरण की कल्पना भी कैसे कर सकते थे?"
25 सितंबर को आंदोलनकारी छात्रों ने कुलपति के ख़िलाफ़ 800 हस्ताक्षरों के साथ उन्हें 'अविश्वास प्रस्ताव' सौंपा और 48 घंटों के भीतर कुलपति पद से इस्तीफ़ा देने की मांग की. इसके बाद छात्रों ने 28 सितंबर को कुलपति के तौर पर डॉ. सुखपाल सिंह को मान्यता देने से इनकार करते हुए, कुलपति को ही एक और पत्र सौंपा.
इस बीच शनिवार को बिलासपुर हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस और विश्वविद्यालय के कुलाधिपति एके त्रिपाठी से छात्रों के एक प्रतिनिधिमंडल ने मुलाकात की. लेकिन ये मुलाकात बेनतीजा रही. इसके बाद छात्रों ने सोमवार से भूख हड़ताल की घोषणा कर दी.
कुलपति डॉ. सुखपाल सिंह ने भी 30 सितंबर को छात्रों के लिए चेतावनी जारी की कि अगर 1 अक्टूबर तक छात्रों ने अपना विरोध प्रदर्शन बंद नहीं किया तो यूनिवर्सिटी उचित कार्रवाई कर सकती है. इसके तहत यूनिवर्सिटी में सामान्य स्थिति की बहाली के लिए यूनिवर्सिटी को अनिश्चितकाल तक के लिए बंद करना भी शामिल है.
लेकिन सोमवार को छात्रों ने भूख हड़ताल शुरू कर दी. इस आंदोलन को विपक्षी दल कांग्रेस पार्टी और छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस समेत कई दूसरे राजनीतिक दलों का भी समर्थन प्राप्त था. इस भूख हड़ताल के समर्थन में राज्य के अलग-अलग इलाकों में कुछ विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों को भी बंद कराया गया.सके बाद शाम होते-होते कुलपति डॉ. सुखपाल सिंह के इस्तीफ़े की ख़बर आ गई.
स्टूडेंट्स बार एसोसिएशन के अध्यक्ष स्नेहल रंजन शुक्ला कहते हैं, "तमाम तरह के गंभीर आरोपों से घिरे कुलपति के ख़िलाफ़ हमारे पास भूख हड़ताल अंतिम रास्ता था, हमने तय किया था कि भूख हड़ताल तब तक जारी रहेगी, जब तक कुलपति इस्तीफ़ा नहीं दे देते. आज हमारी यूनिवर्सिटी आज़ाद हो गई है. "